मैं तुम मे कही रहता हु,तुम मुझमे कही रहती हो,
गज़लो मे वही लिखता हु जो नज़रों से कहती हो।
मैं खुदको बचाकर चलता हु मुश्किल सी इन रहो पर,
ठोकर जो मुझे लग जाये तकलीफ तो तुम सहती हो।
गज़लो मे वही लिखता हु जो नज़रों से कहती हो।
मेरे जिस्म से लेकर रूह तक है सिर्फ तुम्हारी खुशबु,
दिल मे भी धड़कती हो और रग रग मे तुम ही बहती हो।
गज़लो मे वही लिखता हु जो नज़रों से कहती हो।
मेरे अरमानों का क्या है अश्कों मे बह जाएँगे,
कोई कच्ची ईमारत जैसे कतरा कतरा ढहती हो।
गज़लो मे वही लिखता हु जो नज़रों से कहती हो।
मैं तुम मे कही रहता हु,तुम मुझमे कही रहती हो,
गज़लो मे वही लिखता हु जो नज़रों से कहती हो।
Friday, October 12, 2007
तुम........
Posted by
'A' or 'Gazal' jit
at
12:13 AM
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1 comment:
अजित जी ,आपकी ग़ज़ल पढ़ कर हम तो आपके कायल हो गए !आपकी ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब है !वाह , उम्दा , सटीक ....यही शब्द मेरे दिमाग में आ रहे हैं !जितनी तारीफ करें उतनी कम है !सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकार करें !
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